Mon - Sat: 10:00AM - 6:30PM

रतन टाटा से भारतीय रत्न बनने की कहानी


जब लोग आप पर पत्थर फेकें, तो उन पत्थरों का इस्तेमाल स्मारक (MONUMENTS) बनाने में करें

बात जरां गहरी है... क्योकि आपने हमेशा ईट का जवाब पत्थर से देने की बात तो जरूर सुनी होगी, लेकिन यह आख़िर कौन है, जो उन फेंके हुए पत्थरों से स्मारक (MONUMENTS) बनाने की बात कर रहे हैं?

यह शब्द सिद्धांतों और उसूलों के दम पर कामयाबी पाने में भरोसा रखने वाले भारतीय उद्घोगपति रतन नवल टाटा के हैं. रतन टाटा देश के जाने-माने उन व्यक्तियों में से एक हैं, जिन्होंने व्यापार केवल फायदे के लिए नहीं किया बल्कि व्यापार करते समय समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को भी याद रखा और अपने उसूलो पर कायम रहते हुए अपना नाम और पहचान दोनो को बनाया.

सादा जीवन उच्च विचार की रूपरेखा पर जीते हैं जिंदगी

रतन टाटा का जन्म 28 दिसम्बर 1937 को मुंबई में नवट टाटा और सोनू टाटा के घर हुआ, लेकिन जब रतन टाटा सिर्फ 10 साल के थे तभी उनके माता-पिता ने अलग होने का फैसला किया और इसके बाद रतन टाटा को उनकी दादी नवाज़बाई टाटा ने बड़ा किया. रतन टाटा ने एक इंटरव्यूह में अपनी दादी का जिक्र करते हुए बताया है कि उनकी जिंदगी में उनकी दादी नवाज़बाई टाटा का बहुत बड़ा रोल रहा है.

रतन टाटा काफी शर्मिले स्वभाव के है और काफी सादगी के साथ जिंदगी जीने में विश्वास रखते हैं. उन्हें किताबों और पालतू जानवरों से काफी लगाव है. रतन अपने घर पर जब भी थोड़ा समय निकालते हैं तो वह किताबों और कुत्तों के साथ समय बिताना पसंद करते हैं.

रतन टाटा ने अपनी शुरूआती पढ़ाई मुंबई और शिमला से की इसके बाद वास्तुकला में B.S. की डिग्री लेने के लिए में CORNELL UNIVERSITY चले गए. इसके बाद उन्होंने HARWARD BUSINESS SCHOOL से ADAVANCED MANAGEMENT PROGRAME की पढ़ाई पूरी की.

रतन टाटा को U.S. की कंपनी IBM से जॉब का ऑफर आया और उन्होंने इस ऑफर को स्वीकार कर लिया. लगभग 15 दिन उस नौकरी को करने के बाद रतन उसे छोड़कर भारत लौट आए.

कामयाबी के सफर का ऐसे किया आगाज़

रतन टाटा ने 1961 में टाटा ग्रुप के साथ मिलकर अपने करियर की शुरूआत की. टाटा स्टील्स के शॉप फ्लोर पर ब्लास्ट फरनेस के काम को देखा. 1971 में रतन टाटा का प्रमोशन हुआ और वह राष्ट्रीय रेड़ियो और इलैक्ट्रानिक कंपनी (NATIONAL RADIO & ELECTRONIC COMPANY – NELCO) के डायरेक्टर-इन-चार्ज हो गए. उस समय यह कंपनी काफी वित्तीय कठिनाईयों (FINANCIAL CRISIS) का सामना कर रही थी. नेल्को (NELCO) की बाजार में हिस्सेदारी सिर्फ 2% थी और लगभग 40% के घाटे में यह कंपनी जा चुकी थी. रतन ने जेआरडी को सुझाव दिया की उन्हें कंज्यूमर इलैक्ट्रानिक की बजाय टैक्नॉलिजी प्रोडक्ट में ज्यादा इनवेस्ट (INVEST) करना चाहिए. जेआरडी ने रतन की इस बात को माना और कंपनी ने 1972-1975 के दौरान ही बाजार में 40% हिस्सेदारी बढ़ा ली.

यह रतन टाटा की सूझबूझ का ही परिणाम था कि केवल 3 सालों में ही कंपनी घाटे से उभर आई. हालांकि 1995 में जब देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा की तो कंपनी को एक बार फिर से काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा और कंपनी पर सात महीने के लिए ताला भी पड़ा.

1991 में जेआरडी (जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा) ने रतन टाटा को टाटा ग्रुप का चेयरमैन बनाया. इसके बाद रतन टाटा ने टाटा संस के लिए काफी महत्वपूर्ण फैसले लिए. उन्होंने नए पदों पर युवाओं को जिम्मेदारी दी. रतन टाटा के इस प्रभावी फैसले का असर यह रहा कि टाटा कंसंलटैन्सी एक सार्वजनिक निगम बनी और टाटा मोटर्स न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टिड हो गई.

अपनी ज़िद को बनाया जुनून

रतन टाटा ने सन 1998 में व्हीकल के क्षेत्र में हाथ आजमाया और टाटा इंडिका (TATA INDICA) नाम की कार को लांच किया. बाजार में यह कार कुछ ख़ास असर नहीं दिखा पायी और कार एक्सपर्ट्स ने भी इस कार में काफी तकनीकि ख़ामियां (Technical Issues) बतायी. काफी नुकसान में जाने के बाद कंपनी के दूसरे साथियों ने रतन टाटा को कंपनी को बेच कर घाटे की भरपाई करने की सलाह दी.

tatamotors

रतन ने साथियों के सुझाव को मान कर अमेरिका जाकर फोर्ड (FORD) के मालिक बिल फोर्ड के साथ मिटिंग की और अपनी कार कंपनी को उन्हें बेचने का प्रस्ताव रखा. फोर्ड ने रतन का काफी मज़ाक उड़ाया और कहा कि अगर कार बनानी ही नहीं आती है तो इस काम में आए ही क्यों है... आपकी कंपनी को खरीद कर हम आप पर अहसान कर रहे हैं... फोर्ड की यह बात रतन को काफी बुरी लगी और वह बिना किसी डील के ही अपनी टीम के साथ भारत लौट आए. रतन टाटा ने इसके बाद कंपनी को किसी को भी नहीं बेचने का फैसला किया और कार को बेहतर बनाने की रिसर्च करने में जुट गए. काफी समय तक मेहनत करने के बाद रतन टाटा ने कार बाजार में अपने आपको काफी दृढ़ता के साथ स्थापित किया.

इसे इत्तेफाक कहें या बड़े बोल का नतीजा क्योकि कार कंपनी फोर्ड को इतना घाटा हुआ कि फोर्ड के मालिक बिल फोर्ड ने कंपनी को बेचने का फैसला किया. 2008 में टाटा मोटर्स ने जैगुआर (JAGUAR)  और लैंडरोवर (LAND ROVER) को बिल फोर्ड से खरीद लिया. यह सौदा 1.15 अरब पाउंड में हुआ.

टाटा मोटर्स आज भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी कार निर्माण (CAR MANUFACTURING) के क्षेत्र में एक जाना माना नाम है. टाटा हॉरियर, टाटा नैसन, टाटा टिआगो, टाटा जेस्ट, टाटा हेग्जा जैसी कारों को टाटा मोटर्स ने बनाया है और लोगों ने इन्हें काफी पसंद भी किया है.

फैसलों को सही साबित करने में करते हैं विश्वास

मैं सही फैसले लेने में विश्वास नहीं रखता हूँ, फैसले लेकर उन्हें सही साबित करने में विश्वास करता हूँ

यह लाइन रतन टाटा के द्वारा ही कहीं गयी है, और उन्होंने अपनी इस लाइन को सही साबित भी किया है. 2012 में रतन टाटा ने 75 साल की उम्र में टाटा ग्रुप के चेयरमैन पद से खुद को अलग कर लिया. टाटा ग्रुप के नए चेयरमैन सायरस मिस्त्री को रतन टाटा ने ही चुना.

टाटा समूह के साथ हर कोई बिज़नेस करना चाहता है, इसी चाह के साथ जापानी टैलिकॉम कंपनी एनटीटी डोकोमो (NTT DOCOMO) भी टाटा के साथ जुड़कर काम करने के लिए भारत आयी. एनटीटी डोकोमो ने टाटा में 26.5% की  हिस्सेदारी के साथ लगभग 13 हजार करोड़ की इनवेस्टमेंट (INVESTMENT) की. इस इनवेस्टमेंट के साथ ही टाटा ने एनटीटी डोकोमो के साथ एक वादा किया कि जब भी एनटीटी डोकोमो जाना चाहेगी तो वह उसे उस समय की मार्केट वैल्यू के हिसाब से हिस्सेदारी वापिस करेगा.

टाटा डोकोमो नहीं चल पाया और कंपनी नुकसान में जाने लगी. एनटीटी डोकोमो ने टाटा से कहा कि वह उनके लिए कोई दूसरे बॉयर (BUYERS) की तलाश कर दे, लेकिन टाटा समूह ऐसा भी नहीं कर पाया. उस समय तक सायरस मिस्त्री चेयरमैन के पद पर आ चुके थे. सायरस मिस्त्री ने उस समय की मार्केट वैल्यू के हिसाब से एनटीटी डोकोमो को रिटर्न देने से मना कर दिया. उन्होंने कहा कि ऐसा करना घाटे का सौदा होगा. एनटीटी डोकोमो ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया.

ratantata

टाटा समूह दुनिया भर में अपने उसूलों और सिद्धांतों की वजह से भी जाना जाता है. और टाटा समूह की साख पर कोई दाग लगे ऐसा रतन टाटा को मंजूर नहीं था. 24 अक्टूबर 2016 को सायरस मिस्त्री को टाटा संस के चेयरमैन पद से हटा दिया गया. 28 फरवरी को टाटा संस और एनटीटी डोकोमो ने कोर्ट में एक साथ संयुक्त याचिका दायर की और सिर्फ एक ही दिन में मामले को आपसी समझौते से सुलझा लिया.

रतन टाटा ने अपने उसूलो और सिद्धांतों के साथ कोई समझौता नहीं किया और टाटा संस की गरिमा को ऐसे ही बनाये रखने में सहयोग किया.

वादों के पक्के है रतन टाटा

रतन टाटा अपनी कहीं हुई बात पर खरा उतरना अच्छे से जानते हैं. अपनी कल्पना को हकीक़त में कैसे सच करना है इस बात को रतन टाटा बखूबी जानते हैं. रतन टाटा चाहते थे कि हर किसी व्यक्ति का कार खरीदने का सपना पूरा हो. लोगों के इसी सपने को ध्यान में रखते हुए रतन टाटा ने 2008 में नई दिल्ली में आयोजित ऑटो एक्सपो में नैनो कार को दुनिया के सामने पेश किया. यह कार रतन टाटा के ड्रीम प्रोजेक्ट में से एक है. टाटा चाहते थे कि एक ऐसी कार भी हो जिसकी कीमत 1 लाख रूपये तक हो, और उन्होंने अपनी इस बात को नैनो (NANO) को पेश करके पूरा कर दिया.

देश-विदेश में टाटा संस की 100 से भी ज्यादा कंपनियां काम कर रही है

आप अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में टाटा के अनेकों प्रोड्क्स और सेवाओं का लाभ उठाते हैं..

टाटा नमक यानि देश का नमक ये लाइन तो आपने टीवी विज्ञापन (TV ADVERTISING) में सुनी ही होगी...

टाटा नमक देश का नमक होने के साथ-साथ टाटा संस का ही नमक है. इसके अलावा टाटा मोटर्स, टाटा कंसंलटैंसी सर्विस, टाटा एडवांस सिस्टम लिमिटेड, टाटा पॉवर, टाटा कैमिकल, टाटा ग्लोबल बिवरेजेस,टाटा कॉफी, टाटा टेलिसर्विसिस, टाटा वोल्टास एसी, टाइटैन, टाटा टी, यें सभी टाटा की सर्विसिस है जो आप तक पहुंचती हैं.

tatagroup

टाटा संस का भारी हिस्सा जाता है गरीबों की मदद के लिए

रतन टाटा अपनी उदारता और सहजता के लिए भी जाने जाते हैं, टाटा संस का 66% मुनाफा सामाजिक कार्यों के लिए दिया जाता है. इस पैसे को समाज कल्याण में लगाया जाता है. जब 26.11.2008 को मुंबई के ताज होटल में आतंकवादियों ने हमले को अंजाम दिया गया तो टाटा संस ने होटल के सभी कर्मचारियों से लेकर हर स्टॉफ का खर्च उठाया था. टाटा ने होटल के बाहर काम कर रहे हर व्यक्ति को, जो भी उस हादसे का शिकार हुआ था, उसकी मदद की थी. यह बात आप शायद ही जानते होंगे कि ताज़ होटल भी टाटा संस का ही हिस्सा है.

tatajrd

भारत के दो प्रमुख सम्मानों से हो चुके हैं सम्मानित

रतन टाटा के टाटा संस में अहम योगदान को देखते हुए और समाज के प्रति उनकी उदारता को ध्यान में रखते हुए ही भारतीय सरकार उन्हें दो बड़े ही उच्च सम्मान से सम्मानित कर चुकी है. सन 2000 में भारतीय सरकार ने रतन टाटा को भारत के तीसरे सबसे उच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया. इसके बाद समाज में उनके कद को और भी ज्यादा ऊंचा होते देख भारत सरकार ने 2008 में उन्हें दूसरे सबसे उच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया.

रतन टाटा कई और भी दूसरे सम्मानों से नवाज़े जा चुके हैं इतना ही नहीं वह कई बड़ी कंपनियों के बड़े सलाहकारों और महत्वपूर्ण पदों पर आसीन भी रह चुके हैं.

award

रतन टाटा का मानना है कि जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए उतार-चढ़ाव का बना रहना जरूरी है, ईसीजी (ECG) में भी सीधी लाईन का मतलब होता है कि आप जिंदा नहीं हैं

रतन टाटा 81 साल के हो चुके हैं, लेकिन जिंदगी को जीने का उनका ज़ज्बा आज भी कमाल का है

वो कहते हैं कि- वह दिन, जिस दिन मैं उड़ने में असमर्थ रहूंगा, वह दिन मेरे लिए सबसे बुरा दिन होगा

By Soniya