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बॉन्ड क्या है, कितनी तरह के होते हैं और कैसे काम करते हैं?


क्या आपने कभी किसी से कर्ज लिया है?

या फिर आपने किसी को कर्ज दिया है?

अगर आपने किसी को कर्ज दिया है या फिर किसी से कर्ज लिया है तो आप जरूर कर्ज की शर्तों को जानते होंगे उसके भार को समझते होंगे और तब बॉन्ड को समझना आपके लिए काफी आसान होगा...

क्या है बॉन्ड (BOND)?            

जिस तरह से जब आपको पैसे की जरूरत होती है तब आप या तो सेविंग से अपनी उस जरूरत को पूरा करते हैं या फिर किसी से कर्ज लेते हैं. ठीक उसी तरह से जब सरकार पर राजकोषिय घाटे की मार पड़ती है या महत्वपूर्ण कार्यों के लिए पैसे की जरूरत होती है तो सरकार पैसा इकट्ठा करने के लिए बॉन्ड (BOND) जारी करती है. सरकार यह बॉन्ड बड़े इन्वेस्टर्स (BIG INVESTORS) और आम लोगों (COMMON PEOPLE) के लिए जारी करती है. जारी किए गए बॉन्ड को ‘ऋण पत्र’ भी कहते हैं, क्योकि बॉन्ड एक पत्र (LETTER) के फॉर्मैट में होता है. इस लेटर पर बॉन्ड की फेस वैल्यू या बॉन्ड का प्राइस भी लिखा होता है और उस पर मिलने वाला ब्याज दर (INTEREST RATE) भी लिखा होता है. बॉन्ड की ब्याज दर को कूपन रेट भी करते हैं. यह कितने समय के लिए है यह सभी बातें भी इस ऋण पत्र पर लिखी होती हैं. बॉन्ड का प्राईस क्या होना है यह सभी बातें पहले ही तय कर ली जाती है.

वैसे बॉन्ड की समयावधि यानि की टाईम पीरियड एक साल से लेकर पांच साल या दस साल या फिर इससे ज्यादा भी हो सकता है. बॉन्ड की समयावधि को मिच्योरिटी पीरियड (MUTURITY PERIOD) भी कहते हैं. और जब बॉन्ड का पीरियड खत्म हो जाता है तो तय नियमों और शर्तों के अनुसार आपको आपका पैसा वापस मिल जाता है.

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प्राइवेट कंपनियां भी कर सकती है बॉन्ड जारी

बॉन्ड जारी करने का अधिकार केवल सरकार के पास ही नहीं है. प्राइवेट कंपनियां या कोर्पोरेट सेक्टर भी बॉन्ड जारी कर सकती हैं. बॉन्ड की फेस वैल्यू और ब्याज दर ठीक उसी तरह से होती है जिस तरह से सरकारी बॉन्ड की होती है. सरकारी बॉन्ड और प्राइवेट बॉन्ड में अंतर केवल सिक्योरिटी का होता है. सरकारी बॉन्ड को कई हद तक सुरक्षित माना जाता है क्योकि बॉन्ड का पैसा सरकारी कामों में लगाया जाता है. तो वही प्राईवेट बॉन्ड को थोड़ा जोखिम भरा माना जाता है क्योकि प्राइवेट कंपनियो की भविष्य की योजनाओं के बारे में पता नहीं होता है.

बॉन्ड क्या है यह तो जान लिया अब जानते हैं कि बॉन्ड कितनी तरह के होते हैं...

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सरकारी बॉन्ड (SOVEREIGN GOVERNMENT OR GOVERNMENT BOND)

जब सरकार को सरकारी कामों के लिए वित्तीय सहायता की जरूरत होती है तो सरकार एक बॉन्ड जारी करती है. इस बॉन्ड को ऋण पत्र कहते हैं और यह कर्ज की तरह होता है. सरकारी बॉन्ड से इकट्ठा किया गया पैसा सरकारी योजनाओं में लगाया जाता है और इस पैसे की जिम्मेदारी पूरी तरह से सरकार की होती है. इसलिए सरकारी बॉन्ड काफी सुरक्षित माने जाते हैं. सरकारी बॉन्ड को खरीदना लॉंग टर्म इन्वेस्टमेंट (LONG TERM INVESTMENT) के तौर पर देखा जाता है.

म्युनिसिपल बॉन्ड (MUNICIPAL BOND)

जब लोकल सरकार या नगर निगम को अपने प्रोजेक्ट करने, सड़क या स्कूल बनाने या सरकारी कामों के लिए पैसे की जरूरत होती है तो ऐसी स्थिति में लोकल सरकार भी बॉन्ड जारी कर सकती है. इस तरह के बॉन्ड को म्युनिसिपल बॉन्ड कहते हैं. यह भी काफी सुरक्षित होते हैं और इन पर भी ब्याज दर अच्छी मिल जाती है.

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कोर्पोरेट बॉन्ड (CORPORATE BOND)

कोर्पोरेट बॉन्ड वह होते है जो प्राइवेट सेक्टर के जरिए जारी किये जाते हैं. कोर्पोरेट सेक्टर तब बॉन्ड जारी करती है जब उन्हें कर्ज की जरूरत होती है. कोर्पोरेट बॉन्ड पर इंटरेस्ट रेट ज्यादा होता है. इसमें आपको शेयर की तरह कंपनी में हिस्सेदारी नहीं मिलती है. तय किए गए समय पर आपको आपको पैसा इंटरेस्ट के साथ दे दिया जाता है.

सिक्योर बॉन्ड (SECURE BOND)

सिक्योर बॉन्ड ऐसे बॉन्ड होते है जिनमें आपका पैसा सुरक्षित होता है. मतलब अगर आपने किसी कंपनी के बॉन्ड पर अपना पैसा लगाया है और वह कंपनी लगातार घाटे में चल रही है तो इस स्थिति में भी आपको आपका पैसा तय किये गए हिसाब से ही मिलेगा. अगर कंपनी ऐसा करने से मना करती है तो आप उस कंपनी पर केस कर सकते हैं. कंपनी को आपका पैसा वापस करना ही पड़ेगा. इसलिए इसे सिक्योर बॉन्ड कहते हैं.

इनसिक्योर बॉन्ड (INSECURE BOND)

इनसिक्योर बॉन्ड काफी रिस्की (RISKY) होते हैं. इसमें अगर कंपनी घाटे में जाती है या काफी मुनाफा भी कमाती है और वह आपका पैसा रिटर्न नहीं करना चाहती है तो इसमें आप कंपनी के खिलाफ कोई एक्शन नहीं ले सकते हैं. इस तरह के बॉन्ड में नियम और शर्तें काफी लुभावनी होती हैं और इन पर इंटरेस्ट रेट (INTEREST RATE) भी काफी ज्यादा होता है इसलिए लोग इनसिक्योर बॉन्ड में पैसा इन्वेस्ट करने का रिस्क उठा लेते हैं.

ज़ीरो कूपन बॉन्ड (ZERO COUPON BOND)

ज़ीरो कूपन बॉन्ड में कंपनी आपको कोई इंटरेस्ट (INTEREST) नहीं देती है. इसमें प्रोफिट अलग तरह से कमाया जाता है. अगर किसी कंपनी के बॉन्ड की प्राइस वैल्यू (PRICE VALLUE) 1000 रूपये है और वह ज़ीरो कूपन बॉन्ड है, तो आप उस बॉन्ड को 900 रूपये में खरीद सकते हैं. 100 रूपये इस बॉन्ड पर आपका मुनाफा होगा.

प्रपैचुअल बॉन्ड (PERPETUAL BOND)

इस तरह के फंड को लोग काफी पसंद करते हैं. प्रपैचुअल बॉन्ड में ज्यादा शर्तें नहीं होती हैं. प्रपैचुअल बॉन्ड को आप लंबे समय के लिए भी रख सकते हैं और कम समय तक भी रख सकते हैं. इसमें इंटरेस्ट रेट भी काफी अच्छा होता है.

इसकी ख़ास बात यह होती है कि आपके द्वारा खरीदे गए बॉन्ड से आपको कंपनी में हिस्सेदारी मिलती है. यह स्टॉक या फिर इक्विटी की तरह होते हैं. यानि जितने बॉन्ड आपने खरीदें होंगे कंपनी पर उतने प्रतिशत का आपका मालिकाना हक़ होगा.

इनफ्लेशन बॉन्ड (INFLATION LINKED BOND)

इनफ्लेशन बॉन्ड में बॉन्ड का इंटरेस्ट रेट महंगाई की चाल पर निर्भर करता है. महंगाई के हिसाब से आपके बॉंन्ड पर इंटरेस्ट रेट घटता और बढ़ता रहता है.

कॉलऐबल बॉन्ड (CALLABLE BOND)

अगर कंपनी तय समय से पहले ही अपने द्वारा जारी किये गए बॉन्ड को वापस खरीदना चाहती है तो वह ऐसा कॉलऐबल बॉन्ड के अंर्तगत कर सकती है. कंपनी अगर कम समय में अच्छा मुनाफा कमा लेती है और वह चाहती है कि लिया गया कर्ज जल्दी ही वापस कर दिया जाए तो वह कर सकती है. इस स्थिति में आपको कंपनी को बॉंन्ड वापस करना ही होगा आप ऐसा करने से मना नहीं कर सकते हैं.

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कंवर्टिबल बॉंन्ड (CONVERTIBLE BOND)

इस बॉन्ड में आप अगर किसी कंपनी में हिस्सेदारी लेना चाहते हैं यानि किसी कंपनी के शेयर होल्डर बनना चाहते हैं तो आप अपने बॉन्ड को स्टॉक में बदल सकते हैं. अगर आपके पास कंपनी के कुछ बॉन्ड है तो आप उन्हें शेयर्स में बदलकर शेयर धारक बन सकते हैं.

बॉन्ड, लांग टर्म इन्वेस्टमेंट (LONG TERM INVESTMENT) का एक अच्छा तरीका है. अगर आप बॉन्ड में इन्वेस्टमेंट करना चाहते हैं तो पहले रिसर्च जरूर करें और इसके बाद आप बॉन्ड में बेफ्रर हो कर इन्वेस्ट कर सकते हैं.

By Soniya